Artificial Intelligence की तुलना में हम उनसे आगे हैं या पीछे ?!

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी A.Iका इतिहास कोई नया नहीं है प्राचीन काल से ही मनुष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग किसी ना किसी रूप में करता रहा है जिसके प्रमाण प्राचीन खोजों में साफ देखे जा सकते हैं पर जिस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कि हम बात करेंगे उसकी शुरुआत लगभग 20 फ़ीसदी में ही हुई थी और लगभग 20 वीं सदी में शुरुआती रोबोट के निर्माण से लेकर अब तक एक सवाल ने अपनी जगह बरकरार रखी है कि “कहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव मस्तिष्क की जगह तो नहीं ले लेगा “,तो आइए आज हम इसी विषय पर बात करेंगे ।

आज के दौर में भी अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तरक्की को देखें तो यह वहम भी पक्का हो जाता है कि कहीं वाकई में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव मस्तिष्क को पीछे तो नहीं धकेल देगा और इस अंदेशे पर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी अपने मोहर लगा चुके हैं जिनमें से एक नाम है दिवंगत महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का भी।

असल में जिस हिसाब से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में तरक्की हुई है तो यह सवाल उठना लाजमी है कि ही, उदाहरण के तौर पर अगर हेनसन रोबोटिक्स (हॉन्गकॉन्ग)मेक सोफिया को ही ले तो सोफिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि साबित हुई है ।इनफैक्ट हॉन्ग कॉन्ग कम्पनी मेक सोफ़िया की इंटेलिजेंटस् से खुश होकर सऊदी अरब ने अक्टूबर 2017 में उसे अपनी नागरिकता प्रदान की और इस तरह सोफिया पहला रोबोट बनी जिसने किसी देश की नागरिकता प्राप्त की हो ।वहीआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रचार करने और लोगों को इसके प्रति जागरुक करने के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में सोफिया को घुमाया भी गया जिसमें भारत भी एक है ।
जहां पर इसने अपनी इंटेलिजेंस के तरह तरह के प्रमाण दिए।पर जहां इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस इन्वेंशन की तारीफ हुई वही बहुत सी कम्युनिटी ऐसी भी थी जिन्होंने सोफिया को सिर्फ एक खतरे के रुप में ही देखा क्योंकि उनका मानना है कि सोफिया को जिस तरह इंस्टॉल किया गया है, उसके कारण उसकी हाजिरजवाबी/ सीखने की क्षमता मानव के लिए खतरा बन कर उभर सकती है।

और ठीक ऐसा ही कुछ हुआ है Google की स्पीकिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ भी जहां Google द्वारा लांच “स्पीकिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” ने बोर्ड गेम (शतरंज जैसा एक खेल )में विश्व चैंपियन को हरा दिया ,वह भी एक रिकॉर्ड समय में और जिसके बारे में Google दावा कर रही है कि इसका प्रयोग हम टीचिंग में मेडिकल जैसे क्षेत्रों में भी कर सकते हैं ,वहीं पर सोफिया को खतरा मानने वाली कम्युनिटी का मानना है कि स्पीकिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी मानव मस्तिष्क के लिए खतरा ही है और अगर देखा जाए तो जब भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिक्र होगा उसके खतरे सबसे पहले गिनाए जाएंगे जिस में बेरोजगारी ,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा अन्य A.I का निर्माण पृथ्वी पर A.Iका राज जैसे खतरे प्रमुख हैं ।पर वही इनके डवलपर की राय इस सबके इतर है ।

उनका मानना है कि ऐसा संभव नहीं है और उसके लिए उनकी अपनी दलीलें भी हैं। जैसे – A.I डाटा को पढ़कर काम करती है पर डाटा को सोच कर तैयार नहीं कर सकती ।असल में इस दलील के अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इस तरह से ही डिजाइन जा सकता है कि वह अपने इंस्टॉल प्रोग्राम के हिसाब से डाटा को इकट्ठा कर मैनेज करें और कोई A.I चाहे कितनी भी इंटेलिजेंट हो उसके लिए चीजों को खुद से सोचकर तैयार करना मुश्किल ही होगा ,क्योकि उसके लिए अपनी डिजाइनिंग से बाहर जाना एक मुश्किल कार्य होगा।
वहीं अगर मानव की बात करें तो उसके पास डाटा का कोई डिज़ाइन किया भंडार नहीं होता बल्कि वह खुद डाटा जानकारी जुटाकर कार्य करता है । वही जहां मानव के लिए A.I के होने या ना होने का कोई खास फर्क नहीं पड़ता वही A.I का मानव के बिना अस्तित्व संभव ही नहीं है । वही अगर A.I किसी कारण इंसान पर भारी भी पड़ती है तो वह सिर्फ उसे कुछ समय तक ही काबू कर सकती है, वह भी फिजिकली ना कि उसके मस्तिष्क को ।जबकि मानव जब चाहे A.I को कंट्रोल कर सकता है। मानव महसूस कर सकता है, कल्पना कर सकता है, सपने देख सकता है वह भी अपनी खुद की प्रेरणा से ।

जबकिA.I में खुद की प्रेरणा के अभाव के कारण ,वह सिर्फ वो कर सकती है जिसके लिए उसे डिजाइन किया गया है। तो देखा जाए तोA.I भले ही कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए उसके मानव की मस्तिष्क की जगह लेना ना के बराबर है, क्योंकि मानव मस्तिष्क एक स्वायत्त निकाय (free system)है ,जबकिA.I का कोड्स का एक जंजाल मात्र है जिन्हें हमें जिन्हें हम कभी भी डिकोड कर सकते हैं।
पर अब एक सवाल हमारे लिए यहां पैदा हो जाता है कि कही हम भी तो किसी के द्वारा कोडिंग नहीं ??

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